🌬️ हिचकी — जहाँ भावना और विज्ञान मिलते हैं
🌬️ हिचकी — जहाँ भावना और विज्ञान मिलते हैं ✍️ लेखक : विनय तिवारी पुराने लोग कहा करते थे — “कोई तुम्हें याद कर रहा है, इसलिए हिचकी आ रही है।” शायद इसमें कुछ सच्चाई भी है, क्योंकि जब हम किसी को मन से याद करते हैं, तब हमारी सांसों की लय बदल जाती है, और यह वही लय है जो शरीर के भीतर डायाफ्राम नाम की मांसपेशी संभालती है। डायाफ्राम पेट के ऊपरी भाग में स्थित एक गुंबदाकार पेशी है, जो फेफड़ों को ऊपर-नीचे गति देती है। जब यह सामान्य लय में चलता है, तो हमारी सांसें शांत रहती हैं, पर जब अचानक यह संकुचित हो जाता है, तो हवा तेजी से अंदर जाती है और कंठद्वार (Glottis) तुरंत बंद हो जाता है। इसी क्षण पैदा होती है वह छोटी-सी आवाज़ — “हिक्!” यही है हिचकी की असली पहचान। हिचकी आने के कारण अनेक हैं — कभी मसालेदार भोजन, कभी जल्दबाजी में खाना, कभी घबराहट या उत्साह, तो कभी विचारों की गहराई। इन सभी स्थितियों में शरीर के भीतर तंत्रिका तंत्र और डायाफ्राम के बीच का तालमेल बिगड़ जाता है, जिससे अनैच्छिक संकुचन होता है और हिचकी उत्पन्न होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक श्वसन-प्रतिवर्त (respiratory ref...