गिरारी सरकार चिरगांव झांसी , Village Girari, block chirgaon, district Jhansi


गिरारी: एक भूली हुई विरासत

लेखक - विनय तिवारी


11वीं शताब्दी तक यहां चंदेल वंश का शासन हुआ करता था। ध्वानि ग्राम के सामंत को गड़कुंडार (जिनागढ़) मुख्यालय पर राजस्व भेजना पड़ता है| गिरारी और ध्वानि का एक सामंत हुआ करता था। गिरारी एक आवाद ग्राम था। बेतवा के किनारे और पर्वत पर बसा हुआ यह गांव आवागमन के लिहाज से महत्वपूर्ण जगहों में से एक था। क्योंकि यहां स्थित गिरज्जा घाट पर उथला पानी होने के कारण दिन भर राहगीरो का आवागम लगा रहता था। भद्रावती (आज का भांण्डेर) उस समय बहुत विस्तृत शहर था। वहां के व्यापारी यहां से निकल कर महोवा की तरफ व्यापार करने जाते थे। गिरारी से लेकर भद्रावती तक कई जगह शिलाओं पर बने हुए चित्र इस बात का संकेत देते हैं। कुछ लोग तो यहां तक बताते हैं की ग्राम ध्वानी में भी एक चंदेल कालीन प्राचीन मंदिर है जो कहीं गांव में दबा हुआ है।

गिरारी से संबंधित एक प्राचीन कहानी प्रचलित है। गिरारी को ठाकुर बाबा की जन्मस्थली माना जाता है यहां ठाकुर बाबा मंदिर के बगल में ही उनकी बहन कर्णावती का मंदिर भी बना हुआ है कर्णावती को घोड़े की सवारी करने का अत्यंत शौक था। एक दिन घोड़े की सवारी करते हुए कर्णावती का घोड़ा पहाड़ी से नीचे गिर गया और लुढ़कता हुआ बेतवा के समीप जा पहुंचा । जहां कर्णावती के साथ घोड़े ने भी अंतिम सांस ली। वहां घोड़े के पगचिन्ह आज भी मौजूद है। यहां ठाकुर बाबा की तपोस्थली के साथ ही एक गुफा भी मौजूद है जहां पर बाबा ध्यान में लीन रहते थे।

गुफा के नीचे की तरफ जाने पर एक कुंड है जहां से कर्णावती नित्य जल भरकर शिव को अर्पण करती थी।

         पृथ्वीराज चौहान को हराकर मोहम्मद गौरी हाल ही में दिल्ली के सिंहासन पर बैठा था। चूंकि वह एक लुटेरा सुल्तान था। उसके ही शासनकाल में कुतुबुद्दीन ऐबक ने चंदेलों पर आक्रमण कर

दिया और उनकी प्रमुख जगहों को तहस-नहस कर दिया। जहां-जहां कुतुबुद्दीन ऐबक के सैनिक रुकते वहां वहां लूटपाट करते हुए आगे बढ़ जाते थे।

चंदेल वंश का शासन कमजोर होने लगा इसका फायदा उठाते हुए। 12वीं शताब्दी में गड़कुंडार पर खंगार राजपूतों का कब्जा हो गया। 14वीं शताब्दी में तुगलक वंश ने गड़कुंडार के किले पर आक्रमण कर दिया और खंगार वंश का अंत हो गया। बाद में गड़कुंडार को बुंदेलौ के हवाले कर के यहां से चले गए। गिरारी उस समय समृद्ध ग्राम था। यहां वैश्य (बनिये) और क्षत्रियों प्रमुख निवासी थे। यहां के निवासियों के पास बड़ी मात्रा में धन होने के कारण। इस युद्ध में मुस्लिम आक्रांताओं ने गिरारी पर भारी लूटपाट की। इस युद्ध के पश्चात गिरारी से यहां के निवासी कुछ तो लड़ते हुए मारे गए जो बचे वह देश के अलग-अलग हिस्सों में चले गये। यहां के कुछ वैश्य ब्राह्मण ध्वानी में रहे इसके बाद यहां से भी पलायन कर गए। मुस्लिम आक्रांताऔ ने कुछ लोगों को मुस्लिम धर्म अपनाने पर विवश किया। ऐसे मुसलमान लोग काफी समय तक ध्वानी में निवास करते रहे। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय जो मुसलमान यहां निवास करते थे। वह भी यहां से चले गए। कुछ चिरगांव में जाकर बस गए।

इसी कालखंड में विभिन्न आक्रांताओं के कारण भद्रावती का भारी विनाश हुआ।

गिरारी में कुछ ही परिवार बचे थे। 17वीं 18वीं शताब्दी तक यहां व्यापारी आते जाते रहे। इन्हीं व्यापारियों ने यहां दो मंदिर बनवाये एक पश्चिम मुखी हनुमान मंदिर एक जगदंबा मंदिर। लेकिन एकांत और जंगल होने के कारण यहां लूटपाट की घटनाएं बढ़ गई। और लोगों ने यहां से आवागमन बंद कर दिया। अब यहां जो परिवार बचे थे। उनके साथ भी लूटपाट की घटनाएं होने लगी। जो समय और परिस्थितियां के साथ आसपास के गांवों में बसने चले गए। कुछ परिवार आज भी ध्वानी में निवास करते हैं।

गिरारी के बारे में

यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण जगहों में स्थित है। पारीछा बांध से उतरते हुए कल कल करती हुई बेतवा की निर्मल धारा में डुमरउ नदि इसी स्थान पर मिलती है और संगम बनती है। यहां प्राचीन हनुमान मंदिर के साथ-साथ एक देवी मंदिर भी है और विशाल गौशाला लोगों को आकर्षित करती है यहां पर कई घाट, एक कुंड, काली पहाड़ी, एक प्राचीन गुफा, ठाकुर बाबा चबूतरा, कर्णावती चबूतरा, हरदौल चबूतरा, पत्थर पर बने हुए घोड़े के पगचिन्ह, घोराई माता, व्यापारियों के द्वारा बनाया गया अर्ध निर्मित पुल, चंदेलों के द्वारा बनाए गए दो शिला चित्र, और कई प्रकार के पेड़ पौधे इस स्थान को आकर्षित बनाते हैं।

जो मन को स्थिर करे, श्रद्धा से भरे,

वह यहां आकर शांति पाता है।

गिरारी — जहां भूत, वर्तमान और आस्था मिलते हैं एक बिंदु पर।

“जय गिरारी सरकार!”

             ✍️  विनय तिवारी

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