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मां की ममता - एक संघर्ष की कहानी

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        मां की ममता - एक संघर्ष की कहानी  ✍️लेखक- विनय तिवारी    मां नि:स्वार्थ ममता के वृक्ष की वह छांव है जो जीवन भर अपने बच्चों का सुरक्षा कवच बनाकर उनके आसपास रहती है। ऐसे ही मां की एक कहानी है जिसने परिस्थितियों से लड़कर अपने बच्चों का भविष्य सुनिश्चित किया। मां एक हँसते खेलते परिवार की बहू थी। दादी की कुल 7 संतानें थी – तीन बहनें, चार भाई, जिनमें से पापा पांचवें नंबर के थे। पूरे घर के खर्च चलाने की जिम्मेदारी पापा पर ही थी। पापा शहर दूध बेचने जाया करते थे, मम्मी गोबर पानी करती तथा घर का काम करती थी। दादी बड़ी सख्त स्वभाव की थी। मां बताती हैं दादी-दादा अक्सर बात-बात पर विवाद करते रहते थे। एक दिन गुस्से में आकर दादाजी ने आधी जमीन कौड़ियों के दाम में बेच दी। जो कुछ थोड़ी सी जगह-जमीन बची, उस पर घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया। मेरे बड़े पापा कोई काम नहीं करते थे; उनके चार बेटे हैं। नन्ना (पापा के बड़े भाई) भी थोड़ा कुछ काम करते थे और अपना ही खर्चा चलाते थे। उनके कोई संतान नहीं थी। छोटे चाचा दादी के बेहद चहेते थे। उनकी दो बेटियां थीं।...

बुंदेलखंडी हास्य नाटिका: “विलइया चून खा गई"

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  बुंदेलखंडी हास्य नाटिका: “विलइया चून खा गई” ✍️लेखक : विनय तिवारी पात्र: बाई – पुस्सी की दादी, गुस्सैल, झल्लाती पर बेहद प्यारी पुस्सी – एक सीधा-सादा विद्यार्थी लड़का दाढ़ी वाले – स्कूल मास्टर, अनुशासन में सख्त, पर खुद मस्त फूल – बाई का बेटा, भोला-भाला विलइया – घर की चालाक बिल्ली, जो हमेशा कोई न कोई शरारत करती है   स्कूल का बरामदा — सुबह का समय   (बाई तेज़ चाल में आती हैं, झल्लाई हुई) बाई (झल्लाते हुए): का गउ मोड़ा! सबेरे-सबेरे दिमाग खराब कर डारो। (बच्चे पीछे से चिल्लाते हैं): पुस्सी मूतबे गव बाई!! (पुस्सी किताब लिए दौड़कर आता है) पुस्सी: का हो गओ बाई? बाई: घरे किवाड़ खुले छोड़ आए! अब उते विलइया सब चून खा गई। पुस्सी (घबरा के): अरे चल्लोसन खाई हुज्जे, चून हतोई नहीं! बाई (गुस्से में): तू रहन दे! ठठरी के इतनौ बड़ो हो गओ, दिमाग नई है कछू! स्कूल का अंदरूनी कमरा (बाई इधर-उधर देखती हैं, मास्टर जी को ढूंढती हैं) बाई: कायरे हो जा होरई पढ़ाई? बो डाढ़ी वालो मास्टर किते गओ? (मास्टर जी धीरे-धीरे आराम से बाहर आते ह...

चालू की टटिया - गली क्रिकेट

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चालू की टटिया - गली क्रिकेट ✍️लेखक विनय तिवारी  ग्राम ध्वानी की एक छोटी-सी गली में, जहाँ धूल भरी सड़कें और पुराने नीम के पेड़ माहौल को और रंगीन बनाते थे, बच्चों का एक झुंड क्रिकेट खेलने में मगन था। बल्ला लकड़ी का, गेंद पुरानी टेनिस बॉल, और स्टंप्स? बस तीन टूटी-फूटी टहनियाँ! गली के कोने में चालू भैया का घर था, जो हमेशा बच्चों की शोर-शराबे से तंग रहते थे। उस दिन खेल जोरों पर था। अनि, गली का सबसे तेज बल्लेबाज, क्रीज पर था। उसने गेंदबाज की गेंद पर जोरदार शॉट मारा। "छक्का!" चिल्लाए बच्चे, लेकिन गेंद सीधे चालू भैया के आँगन में जा गिरी। खटाक!  कहीं कुछ टूटने की आवाज आई। अरे मेरी टटिया? चालू भैया गुस्से में बाहर निकले, हाथ में लाठी लिए। "कौन मारा ये गेंद? मैं तुम सबके घर जाकर शिकायत करूँगा! अगर ये गेंद किसी को लग जाए तो? बंद करो ये लुडिया पटिया का खेल!" बच्चे सहम गए। तभी गली के दूसरे छोर से अंशुल के बब्बा, बुजुर्ग मगर जोशीले, लाठी टेकते हुए निकल पड़े।  "अरे चालू, बच्चों को क्यों डाँट रहा है? खेलने दे, बचपन है इनका!" चालू और अंशु...

पार्वती और इमली का पेड़

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पार्वती और इमली का पेड़ लेखक - विनय तिवारी गांव के पूर्वी छोर पर, जहां बेतवा नदी की एक छोटी धार बहती थी, वहीं रहती थी पार्वती। नाम बड़ा था — पार्वती! पर स्वभाव में भय का साया हमेशा छाया रहता था। जब बाढ़ आई, उसका घर नदी में बह गया। फिर उसने खेत की मेड़ पर नया घर बना लिया। वह रोज मजदूरी करके लौटती — सिर पर टोकरी, आंखों में थकान और मन में भगवान का नाम। रास्ते में एक जगह थी — सुनसान, निर्जन, पर विशाल। वहीं खड़ा था एक पुराना इमली का पेड़, जिसकी जड़ें मानो धरती को बांधे रखती थीं। एक दिन शाम को लौटते समय पार्वती को लगा जैसे कोई पीछे चल रहा है। पैरों की आहट, कपड़ों की सरसराहट, और हवा में किसी के सांस लेने की आवाज़। वह तेज़-तेज़ चलने लगी। घर पहुंचते ही बेहोश होकर गिर पड़ी। होश आया तो बोली — “वो…वो सफेद कपड़े वाला… मेरे पीछे था!” घरवाले हंसे। किसी ने कहा — “रात का वहम है पार्वती, डर छोड़!” पर पार्वती की आंखों में आतंक था। अब यह रोज़ का किस्सा बन गया — कभी “इमली से कोई कूदा”, कभी “पत्थर फेंका”, कभी “धक्का दिया”। गांव में चर्चा फैल गई — “इमली वाले रास्ते में कुछ है!” धीरे-धीरे यह बात प...

स्वर्गनामा: एक महात्मा की ग़लती

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          स्वर्गनामा: एक महात्मा की ग़लती लेखक - विनय तिवारी        स्वर्ग और नर्क के द्वार पास-पास ही थे। नर्क का दरवाज़ा भव्य, विशाल और अत्यंत आकर्षक था – इत्र छिड़का, रंगीन झालरों से सजा हुआ, ढोल-नगाड़े बजते और अप्सराएं कतार में खड़ी – मानो कोई पाँच सितारा स्वागत समारोह चल रहा हो। दूसरी ओर स्वर्ग का दरवाज़ा छोटा था, परंतु नक्काशीदार, कलाकृतियों से सुसज्जित। वहाँ न इत्र था, न बैंड-बाजा, बस एक लंबी दाढ़ी वाले बाबा गंगाजल के छींटे मारते हुए आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे। स्वर्ग और नर्क के बीच एक विशाल दीवार थी – पारदर्शी नहीं, मजबूत और ऐसी कि किसी भी तरफ़ की गतिविधियाँ दूसरी ओर महसूस न हो सकें। लेकिन... एक ध्वनि-गुंजालय (Sound Hall) था – जहाँ से नरक में मधुर संगीत, घुंघरुओं की छनछनाहट और हँसी के ठहाके सुनाई देते थे – ताकि स्वर्ग वाले भी नर्क की मस्ती से वंचित न रहें। एक महात्मा, जिनका जीवन भजन, योग, प्राणायाम, सात्विक भोजन और नियमों में बीता था – तुलसी माला, रुद्राक्ष और दाल-रोटी के साथ – अंततः दिवंगत हुए। यमराज स्वयं उन्हें लेने आ...

कट्टा की बारात

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    कट्टा की बारात (देसी व्यंग्य कथा — विनय तिवारी) जिला झांसी के चिरगांव ब्लॉक का एक छोटा-सा गांव है धमना। वहीं एक व्यक्ति रहा करता था — नाम था उसका कट्टा। अब नाम ऐसा कि सुनने वाला दो बार सोचे — पर गांव में कोई हैरान नहीं होता था। कट्टा सबका प्यारा, भला आदमी था। एक दिन गांव की एक बारात निकलनी थी। ट्रैक्टर उसी का था, और चलाना भी उसी का काम। लेकिन रातभर जागने के बाद थककर बेचारा ट्रॉली में ही लेट गया। ड्राइविंग का जिम्मा किसी और ने संभाल लिया। रात बीत गई, बारात पहुंची, नाच-गाना हुआ, खाना-पीना हुआ, और जब लौटने का वक्त आया — तब तक भोर के तीन बज चुके थे। रास्ते में पड़ा सैंदरी थाना। ट्रैक्टर गुजरा ही था कि पुलिस ने ललकार दी — “ओए! कौन है? कहां से आ रहे हो?” बाराती सहम गए। जो चला रहा था, बोला — "भईया, ट्रॉली में से कट्टा को उठा लो।” बस फिर क्या था! सिपाही की मूंछ तन गई, राइफल की नली सीधी — “अच्छा! पुलिस को धमकाते हो? कट्टा भी रखते हो?” और फिर दो झन्नाटेदार तमाचे बरस गए बेचारे ड्राइवर पर। ड्राइवर हकलाता बोला — “साहब, आदमी का नाम है... कट्टा!” थोड़ी देर के लिए सन्नाटा, फिर...

कान्हा – एक अधूरी प्रेमकथा

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कान्हा – एक अधूरी प्रेमकथा ✍️ लेखक – विनय तिवारी कान्हा... नाम ही प्रेम का पर्याय था। पूरा नाम कृष्ण मुरारी। माँ के स्नेह से वंचित, पाँच वर्ष की आयु में ही वह संसार की सबसे बड़ी कमी झेल चुका था — माँ का जाना। पिता संगीत पार्टी में रहते — सुर और ताल में डूबे हुए, पर पुत्र के लिए मन के तार कभी नहीं झंके। धीरे-धीरे कान्हा ने बचपन की चौखट पार की, और युवावस्था की देहरी पर आ खड़ा हुआ। गाँव के बच्चे रोज़ धमना नदी पार कर स्कूल जाते। उसी टोली में कान्हा भी था। मैं तब दस वर्ष का था, छठी कक्षा में पढ़ता था, जबकि कान्हा सातवीं में। कान्हा के दिल में उस समय प्रेम का पौधा अंकुरित हो चुका था। वह बारेई गाँव की लड़की क्रांति से एकतरफा प्रेम करता था। मगर कह नहीं पाता था। उसकी आँखों में क्रांति बस चुकी थी, पर शब्दों में आने की हिम्मत नहीं थी। वह हमें बड़ी-बड़ी बातें सुनाता — “एक दिन मैं क्रांति को लेकर मुंबई चला जाऊँगा…” हम सब हँस देते, पर उसके चेहरे पर वही मासूम यकीन झलकता था। तब अजय देवगन की फिल्में चल रही थीं — कान्हा अक्सर आईने के सामने आँखें मटकाने का अभ्यास करता, नाक सिकोड़ता, और हमें “...

लल्लू की कंघी

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लल्लू की कंघी लेखक – विनय तिवारी       सर्ट पर क्रीच, बेलबॉटम पैंट, बाल एकदम टनाटन — मैं अचंभित था। पचास किलोमीटर बाइक चलाकर आना, वो भी हेलमेट के साथ, सूरत-ए-हाल तो बिगड़ ही जाती है, मेकअप, हुलिया सब उड़ जाता है, पर लल्लू तो जैसा का तैसा! रहस्य तो कुछ था। जब मेरी नज़र लल्लू की जेब पर पड़ी, तो असली कहानी समझ आई — वो “पेन जैसी दिखने वाली कंघी”! हर वक्त जेब से ऐसे लटकती, मानो उसी जगह की मालकिन हो। सर्ट के साथ उसकी ऐसी पकड़, कि बिना खींचे बाहर न आए। लल्लू खेत में झुककर पानी दे रहा हो या सड़क पर दौड़ रहा हो — कंघी की पकड़ ऐसी कि लटक जाएगी पर टपकेगी नहीं। कभी मज़ाक में दोस्तों ने निकालने की कोशिश की, पर जेब का कोना फट जाएगा, तब जाकर बाहर निकलेगी! अगर किसी दिन कंघी खो जाती, तो उसी वक्त साइकिल घर से निकलती, और तीस मिनट में नई कंघी जेब में होती। जुदा न हुई कंघी, उम्र ही बढ़ती रही, बदल गया ज़माना, सान कंघी की बढ़ती रही। बदलती रही साइज जेबों की, फर्क न पड़ा, पांच की कंघी सदा धड़कन बढ़ाती रही। दौर बदले, लोग बदले, रिश्ते बदलते रहे, बालों के रंग बदलते रहे, जीवन के ढंग बदलते...

दरबार का चाकू

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दरबार का चाकू (एक सच्ची घटना – लेखक: विनय तिवारी) साल था 2010 या शायद 2011। चाचा का लड़का अंशू उस वक्त दस बरस का था। पास के गांव मुराटा में माता का दरबार लगता था। कहते थे — वहां देवी साक्षात उतरती हैं, लोगों के मन की बातें जानती हैं, मनोकामनाएँ पूरी करती हैं, और हर समस्या का समाधान देती हैं। मैं भी जिज्ञासावश वहां जाने को तैयार हुआ। अंशू ने जिद की तो उसे साइकिल पर आगे बिठाया और निकल पड़ा। मुराटा मुश्किल से दो किलोमीटर दूर था। करीब पंद्रह मिनट में पहुंच गया। साइकिल ताला लगाई, और भीड़ के बीच जगह तलाशने लगा। अंशू पीछे था। दरबार के सामने एक लड़की देवी से ग्रस्त थी — उसकी जीभ बाहर निकली हुई, सांसें तेज़, बाल खुले और बिखरे हुए, सामने नींबू रखे थे और उनके ऊपर एक चाकू रखा था। वातावरण देवी के जयकारों से गूंज रहा था। मैं लगभग आठ मीटर पीछे था जब अचानक उसने वह चाकू उठाया — और सीधे हमारी तरफ फेंक दिया! पल भर को समय जैसे थम गया। चाकू अंशू के बालों को छूता हुआ दीवार से जा टकराया। हम दोनों सिहर गए। भीड़ दौड़ी, हमें पकड़ लिया। किसी ने पूछा — “क्या तुमने बेल्ट पहन रखी है?” मैंने कहा — “नहीं।...