विरासत और आत्मसम्मान
विरासत और आत्मसम्मान ✍️लेखक : विनय तिवारी यह कहानी नहीं, एक जीवंत विरासत का महाकाव्य है। उस दिन जब मेरे भीतर अपने पुरखों के रक्त की गूंज सुनाई दी, तो मैं अपनी तारा बुआ के पास जा बैठा। बुआ की आँखों में अतीत की एक चमक कौंधी, स्मृतियों के कपाट खुले और जब उन्होंने बोलना शुरू किया, तो लगा मानो इतिहास स्वयं शब्द बनकर बह रहा हो... "ध्वानी निज निवास"—यह केवल ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि अनगिनत झंझावातों, उत्सवों और आंसुओं को अपने भीतर समेटे एक जीती-जागती विरासत है। इस आंगन ने कई महापुरुषों को आते और जाते देखा। यहाँ की माटी गवाह है कि सत्ता और पद आते-जाते हैं, पर स्वाभिमान अमर रहता है। इस गौरवशाली इतिहास के कई पन्ने समय के साथ ओझल हो चुके हैं जहां तक हमें जानकारी है समाधिया परिवार की इकलौती लाडली बिटिया से, जिनका विवाह लकारा (झांसी) के उस महानायक से हुआ, जिनका नाम सुनते ही आज भी लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है—श्री गोविंद दास (कुम्वार) मिश्रा जी! गोविंद दास जी केवल एक नाम नहीं, एक युग थे। उनका ठाट-बाट, उनका दबदबा ऐसा था मानो साक्षात कोई महाराजा धरती पर ...