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जनरल डिब्बा: जहाँ 'भारत' अपनी असली रफ़्तार पकड़ता है

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जनरल डिब्बा: जहाँ 'भारत' अपनी असली रफ़्तार पकड़ता है (लखनऊ से झाँसी तक की एक यादगार यात्रा) ✍️ लेखक विनय तिवारी यदि आपने कभी ट्रेन के जनरल कोच में सफर नहीं किया, तो समझिए, आपने अब तक भारत की सबसे सच्ची यात्रा नहीं की। वहाँ न टिकट की हैसियत मायने रखती है, न सीट की औकात — बस आदमी, उसकी चाहतें और धैर्य — सब एक ही बोगी में ठुँसे रहते हैं। आइए, एक नज़र डालते हैं उस अखाड़े पर, जिसे जनरल डिब्बा कहते हैं। ट्रेन जैसे ही लखनऊ प्लेटफ़ॉर्म संख्या 6 पर पहुँची, दरवाज़े को थामने के लिए यात्रियों की अल्पकालिक मैराथन शुरू हो गई। ट्रेन के रुकते ही, उतरने वालों को मानवीय बाधा मानते हुए, यात्री अंदर घुसने को आतुर थे।  कुछ दरवाज़े पर लटककर वीरता दिखाने लगे, और जो ज़्यादा समझदार थे, वे उतरती भीड़ का रास्ता रोककर चढ़ने की तैयारी में जुटे थे। “अरे भाई, जल्दी कर! अंदर जा, खाली है आगे!” भीतर से आवाज आई — “खाली कहाँ है रे, साँस लेने तक की जगह नहीं!” तभी दूसरा यात्री, जो 'खाली जगह' के दर्शन करने में असमर्थ था, बोला, "अरे ज्ञानी पुरुष! यहाँ खड़े होने की जगह नहीं है, मैं वहां तैरकर ...

प्रैक्टिकल का पंचर

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🧪 प्रैक्टिकल का पंचर ✍️लेखक : विनय तिवारी  बात 2008 की है जब मैं 11 वीं कक्षा था। सरदार पटेल इंटर कॉलेज, चिरगांव में बायोलॉजी का प्रैक्टिकल होना था। एक दिन पहले ही आदेश बोर्ड पर नोटिस चस्पा हुआ —   “कल बायोलॉजी प्रैक्टिकल परीक्षा दो शिफ्टों में होगी — पहली शिफ्ट में B4 वाले, दूसरी में B5 वाले।” मैं B4 में था, यानी मेरी परीक्षा पहली शिफ्ट में थी। लेकिन मेरा जिगरी दोस्त B5 में था। उसने कहा — “भाई, शाम की शिफ्ट में दे देना, आराम से होगा।” मैंने कहा — “ठीक है, शाम की ही सही।” बस, यहीं दिमाग ने गड़बड़ कर दी। अब मुझे यही याद रहा कि प्रैक्टिकल शाम को है! अगले दिन आराम से खाना खाकर, बालों में तेल डालकर, साइकिल पर झोला टाँग मैं कॉलेज रवाना हुआ। जब 2:00 बजे पहुंचा, तो देखा सब बच्चे घर जाने की तैयारी में थे — पहली शिफ्ट तो कब की समाप्त हो चुकी थी! मेरी क्लास का एक साथी, राजकुमार सविता, जिसके पास फाइल नहीं थी, वो भी प्रैक्टिकल नहीं दे पाया था। अब दोनों एक ही नाव में सवार थे — “ना घर के रहे, ना घाट के।” उन दिनों हमारे क्लास टीचर अविनाश तिवारी सर का ऑपरेशन हुआ था, तो उनकी जगह प...