विरासत और आत्मसम्मान
विरासत और आत्मसम्मान
✍️लेखक : विनय तिवारी यह कहानी नहीं, एक जीवंत विरासत का महाकाव्य है। उस दिन जब मेरे भीतर अपने पुरखों के रक्त की गूंज सुनाई दी, तो मैं अपनी तारा बुआ के पास जा बैठा। बुआ की आँखों में अतीत की एक चमक कौंधी, स्मृतियों के कपाट खुले और जब उन्होंने बोलना शुरू किया, तो लगा मानो इतिहास स्वयं शब्द बनकर बह रहा हो...
"ध्वानी निज निवास"—यह केवल ईंट-पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि अनगिनत झंझावातों, उत्सवों और आंसुओं को अपने भीतर समेटे एक जीती-जागती विरासत है। इस आंगन ने कई महापुरुषों को आते और जाते देखा। यहाँ की माटी गवाह है कि सत्ता और पद आते-जाते हैं, पर स्वाभिमान अमर रहता है।
इस गौरवशाली इतिहास के कई पन्ने समय के साथ ओझल हो चुके हैं जहां तक हमें जानकारी है समाधिया परिवार की इकलौती लाडली बिटिया से, जिनका विवाह लकारा (झांसी) के उस महानायक से हुआ, जिनका नाम सुनते ही आज भी लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है—श्री गोविंद दास (कुम्वार) मिश्रा जी!
गोविंद दास जी केवल एक नाम नहीं, एक युग थे। उनका ठाट-बाट, उनका दबदबा ऐसा था मानो साक्षात कोई महाराजा धरती पर उतर आया हो। जब वे अपने ऊंचे, सजीले घोड़े पर सवार होकर निकलते थे, तो आगे-पीछे चलने वाले अनुचरों के कदमों की थाप से धरती कांप उठती थी। लगातार १२ वर्षों तक वे जनता के निर्विवाद प्रधान रहे, ठेकेदारी की, समाज में उनका कद गगनचुंबी था। परंतु, उस वज्र जैसे कठोर और प्रतापी शरीर के भीतर एक अत्यंत कोमल और दयालु हृदय धड़कता था। वे दीनों के रक्षक और न्याय के साक्षात देवता थे।
समय बदला, और नियति ने एक नया मोड़ लिया। मिश्रा परिवार की शान को आगे बढ़ाने के लिए केवल एक ही दीपक था—मेरी अद्वितीय, प्रखर दादी। वे अपने पिता की तरह ही तेजस्विनी, स्वाभिमानी और शेरनी की तरह निडर थीं।
जब उनका विवाह दतिया निवासी श्री रामसेवक तिवारी जी से हुआ, जिन्होंने इस मिट्टी को धन्य कर दिया। दादा जी भले ही भौतिक रूप से उतने संपन्न नहीं थे, परंतु वे गुणों के कुबेर थे। वे ग्राम ध्वानी में आकर बस गए। एक तरफ दादी का राजसी तेज था, तो दूसरी तरफ दादा जी साक्षात ऋषि स्वरूप थे—सीधे-साधे ब्राह्मण, शास्त्रों के ज्ञाता, अध्यात्म में लीन रहने वाले दादाजी! परंतु, अन्याय के सामने वे काल बन जाते थे; लाठी चलाने और मल्ल युद्ध (कुश्ती) में उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था।
गाँव वाले दद्दा (गोविंद दास जी) को देखते ही आदर से झुक जाते थे। कोई उन्हें 'लकारा वाले महाराज' कहता, तो कोई 'लकारा वाले जीजा'। उनका ऐसा प्रताप था कि बड़े-बड़े सूरमाओं की भी उनके सामने बैठने की हिम्मत नहीं होती थी।
बुआ की आँखें भर आईं जब उन्होंने याद किया कि दद्दा का घर किसी सरकार के दरबार से कम नहीं था। सुबह से रात तक लोगों का तांता लगा रहता था। किसी को पुलिस थाने से न्याय दिलाना हो, किसी पीड़ित को राहत दिलानी हो, या किसी असहाय की मदद करनी हो—दद्दा जी हर समय तत्पर रहते थे।
घर में भले ही काम करने वालों की सेना थी, पर दद्दा का एक ही नियम था—'मेरे द्वार से कोई भूखा नहीं जाएगा।' और इस महायज्ञ की 'अन्नपूर्णा' बनीं हमारी बड़ी बुआ! पूरा दिन चूल्हे की आग के सामने, सैकड़ों लोगों के लिए भोजन बनाते-बनाते बीत जाता था, पर चेहरे पर कभी शिकन तक न आई। सेवा का ऐसा अनुपम उदाहरण कहीं और न मिला।
दादी-दादा के संसार में चार बेटियां और तीन बेटे चहक रहे थे। दादी मेहमानों और सामाजिक व्यवस्थाओं में व्यस्त रहती थीं, और दादा खेती किसानी संभालते थे। दादा दादी जी कभी-कभी आपस में झगड़ लेते थे पर उस तकरार में भी असीम प्रेम छुपा होता था।
दद्दा की उस गौरवशाली सामाजिक और राजनीतिक विरासत की कमान संभाली परिवार के बड़े बेटे यानी हमारे ताऊ जी ने। सन 1987 तक दद्दा जी का साया परिवार पर रहा। वे एक बरगद के पेड़ की तरह थे, जिनके जाने के बाद मानो एक युग का अंत हो गया।
समय ने करवट बदली। नई पीढ़ी आई। दादा जी राजनीति के प्रपंचों से दूर अपने भजन-पूजन और खेतों में लीन हो गए। ताऊ जी ने प्रयास तो बहुत किया, पर दद्दा जैसा सूर्य बार-बार उदित नहीं होता। परिवार बड़ा हुआ, बहुएं आईं, और दादी का वह साम्राज्य जो कभी पूरे समाज पर था, सिमटकर घर के भीतर बहूऔं तक रह गया।
और फिर नियति का वह क्रूर नियम लागू हुआ... एक अखंड शक्ति, तीन भाइयों के तीन अलग-अलग हिस्सों में बंट गई। जब तक वे एक मुट्ठी थे, समाज में उनकी धमक थी, पर अलग होते ही वह राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी बिखर गया।
कहानी समाप्त करते हुए बुआ का स्वर गंभीर और ओजस्वी हो गया। उन्होंने कहा:
"बेटा! आज की राजनीति को देखो—यह चापलूसों, स्वाभिमान बेचने वालों और तलवे चाटने वालों की दासी बन चुकी है। परंतु, हमारे पुरखों का इतिहास गवाह है, हमारा एक-एक कतरा आत्मसम्मान और गौरव से निर्मित हुआ है। हम झुक सकते हैं, टूट सकते हैं, लेकिन अपनी आत्मा का सौदा कभी नहीं कर सकते! इसीलिए आज हमारे खून का कोई भी सदस्य इस पतित राजनीति के कीचड़ में पैर नहीं रखना चाहता। हमें गर्व है कि हम उस मिट्टी के अंश हैं जहाँ केवल स्वाभिमान फलता-फूलता है!"
बुआ की बात सुनकर मेरे भीतर का सोता हुआ स्वाभिमान जाग उठा, सचमुच... मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा!
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