जनरल डिब्बा: जहाँ 'भारत' अपनी असली रफ़्तार पकड़ता है
जनरल डिब्बा: जहाँ 'भारत' अपनी असली रफ़्तार पकड़ता है
(लखनऊ से झाँसी तक की एक यादगार यात्रा)
✍️लेखक विनय तिवारी
यदि आपने कभी ट्रेन के जनरल कोच में सफर नहीं किया,
तो समझिए, आपने अब तक भारत की सबसे सच्ची यात्रा नहीं की।
वहाँ न टिकट की हैसियत मायने रखती है, न सीट की औकात —
बस आदमी, उसकी चाहतें और धैर्य — सब एक ही बोगी में ठुँसे रहते हैं। आइए, एक नज़र डालते हैं उस अखाड़े पर, जिसे जनरल डिब्बा कहते हैं।
ट्रेन जैसे ही लखनऊ प्लेटफ़ॉर्म संख्या 6 पर पहुँची, दरवाज़े को थामने के लिए यात्रियों की अल्पकालिक मैराथन शुरू हो गई। ट्रेन के रुकते ही, उतरने वालों को मानवीय बाधा मानते हुए, यात्री अंदर घुसने को आतुर थे।
कुछ दरवाज़े पर लटककर वीरता दिखाने लगे,
और जो ज़्यादा समझदार थे, वे उतरती भीड़ का रास्ता रोककर
चढ़ने की तैयारी में जुटे थे।
“अरे भाई, जल्दी कर! अंदर जा, खाली है आगे!”
भीतर से आवाज आई —
“खाली कहाँ है रे, साँस लेने तक की जगह नहीं!”
तभी दूसरा यात्री, जो 'खाली जगह' के दर्शन करने में असमर्थ था, बोला, "अरे ज्ञानी पुरुष! यहाँ खड़े होने की जगह नहीं है, मैं वहां तैरकर जाऊँ?"
बोगी ऐसी भरी थी कि हवा भी सोच-समझकर गुजरती थी।
फिर भी लोग किसी न किसी तरह फिट हो ही जाते हैं —
क्योंकि भारत में जगह नहीं, जुगाड़ चलता है।
पैर रखने की जगह ढूँढना भी एक गणितीय चुनौती थी। इससे पहले कि कोई यात्री अपनी निराशा पर चिंतन कर पाता, दरवाज़े पर 'अखंड भारत' के प्रतीक कई लोग जमा हो चुके थे।
धीरे-धीरे ट्रेन अपनी गति पकड़ने लगी, और इसी के साथ शुरू हुआ अर्थव्यवस्था का चलता-फिरता प्रदर्शन। एक समोसे वाला प्रकट हुआ, "बीस के तीन, बीस के तीन, गरमा गरम!" उसके पीछे चाय वाला चाय गरमा गरम चाय। हैरानी की बात यह थी कि जहाँ हमें हिलने की जगह नहीं मिल रही थी, वहीं ये विक्रेता भीड़ को ऐसे चीरते हुए निकल जाते थे, जैसे वे गुरुत्वाकर्षण के नियमों से मुक्त हों। उनके लिए वह भीड़ नहीं, बस पैसे कमाने का रास्ता थी।
कुछ यात्री सीट पर बैठने के लिए ऐसे उलझ रहे थे, मानो वह सीट नहीं, सत्ता का सिंहासन हो।
सीट पाने वाले यात्री खड़े यात्रियों को ऐसे देखते थे, जैसे वे पृथ्वी के बोझ हों और ये भाग्यशाली लोग बुद्धिजीवी वर्ग के सदस्य। वे सीट पर ऐसे तनकर बैठते थे, मानो उन्होंने केवल टिकट नहीं, बल्कि डिब्बे का स्वामित्व भी खरीद लिया हो। उनका पाँव फैलाना, खड़ी सवारी को ज्ञान देना—"भाई कहीं सीट खाली हो तो बैठ जाओ, हवा आने दो"—और अपनी मर्जी से खिड़की खोलना-बंद करना, उनके साम्राज्य के नियम थे।
बोगी में बहसों का संसद सत्र
थोड़ी देर में जनरल डिब्बा
एक चलती हुई संसद में बदल गया।
एक कोने में राजनीति —
“इस बार सरकार गई समझो!”
दूसरे कोने में क्रिकेट —
“बुमराह जैसा बॉलर फिर नहीं आएगा!”
और बीच में फ़िल्मी दुनिया —
“भाई, सनी देओल अभी भी फिट है!”
जो बोल नहीं रहे थे,
वे सुन रहे थे —
और सुनते-सुनते शायद सोचना भी भूल गए थे।
में चुपचाप एक सीट के पास खड़ा इन दृश्यों का साक्षी बन रहा था, तभी एक मजेदार घटना हुई। एक भले-से सज्जन ने आकर एक अकड़ू सीटधारी से कहा, "भैया, थोड़ी जगह कर दो, पैर दर्द हो रहा है।"
सीटधारी ने तुरंत अहंकार की सीमाएँ स्पष्ट कर दीं: "अरे नहीं-नहीं, यहां जगह नहीं है, आगे देखिए।"
पर तभी, नशे में धुत एक निर्भीक यात्री प्रकट हुआ। उसने बिना पूछे, उस अकड़ू यात्री को धक्का दिया और धम्म से सीट पर बैठ गया! फिर उन्हीं अकड़ू यात्रियों की ओर देखकर गर्जा, "दिखाई नहीं दे रहा है? भाईसाहब आकर बैठ गए हैं! जगह करो! और हाँ, भगवान का नाम लिया करो, बोलो जय बजरंगबली की!"
जो यात्री कुछ देर पहले तक अपनी सीट के मालिक बने बैठे थे, वे अब भीगी बिल्ली बनकर सीट से चिपक गए और उस शराबी के 'ज्ञान' में हाँ में हाँ मिलाने को मजबूर हो गए।
जिस सज्जन यात्री को जगह नहीं मिली थी, उसने मेरी ओर देखकर धीमी मुस्कान के साथ कहा, "भगवान सब देखता है।"
थोड़ी देर बाद छह-सात हिजड़े बोगी में चढ़े।
तालियों की आवाज़, मुस्कानें, दो-चार हल्के संवाद —
और फिर वे दुआएँ देते हुए आगे बढ़ गए।
जनरल डिब्बे की थकान
थोड़ी देर के लिए मानो मुस्कान में बदल गई।
झाँसी पहुँचते-पहुँचते
छह घंटे का सफर बीत गया —
पर इस दौरान मैंने जो देखा,
वो किसी यात्रा से बढ़कर था।
यहाँ कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं —
सिर्फ़ यात्री थे।
किसी के चेहरे पर थकान थी,
किसी की आँखों में उम्मीद,
किसी की ज़ुबान पर बहस,
और किसी की हथेलियों में प्रार्थना।
तब जाना
असली भारत न तो संसद में है, न ही चमकते मॉल्स में; यह तो इसी जनरल डिब्बे में, धक्का-मुक्की, समोसे की खुशबू, और 'जय बजरंगबली' के नारों के बीच,
वहीं, जहाँ लोग भीड़ में भी
एक-दूसरे को जगह देना सीखते हैं।
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