प्रैक्टिकल का पंचर
🧪 प्रैक्टिकल का पंचर
✍️लेखक : विनय तिवारी
बात 2008 की है जब मैं 11 वीं कक्षा था। सरदार पटेल इंटर कॉलेज, चिरगांव में बायोलॉजी का प्रैक्टिकल होना था।
एक दिन पहले ही आदेश बोर्ड पर नोटिस चस्पा हुआ —
“कल बायोलॉजी प्रैक्टिकल परीक्षा दो शिफ्टों में होगी —
पहली शिफ्ट में B4 वाले,
दूसरी में B5 वाले।”
मैं B4 में था, यानी मेरी परीक्षा पहली शिफ्ट में थी।
लेकिन मेरा जिगरी दोस्त B5 में था। उसने कहा —
“भाई, शाम की शिफ्ट में दे देना, आराम से होगा।”
मैंने कहा — “ठीक है, शाम की ही सही।”
बस, यहीं दिमाग ने गड़बड़ कर दी।
अब मुझे यही याद रहा कि प्रैक्टिकल शाम को है!
अगले दिन आराम से खाना खाकर, बालों में तेल डालकर,
साइकिल पर झोला टाँग मैं कॉलेज रवाना हुआ।
जब 2:00 बजे पहुंचा,
तो देखा सब बच्चे घर जाने की तैयारी में थे —
पहली शिफ्ट तो कब की समाप्त हो चुकी थी!
मेरी क्लास का एक साथी, राजकुमार सविता, जिसके पास फाइल नहीं थी,
वो भी प्रैक्टिकल नहीं दे पाया था।
अब दोनों एक ही नाव में सवार थे —
“ना घर के रहे, ना घाट के।”
उन दिनों हमारे क्लास टीचर अविनाश तिवारी सर का ऑपरेशन हुआ था,
तो उनकी जगह परशुराम सर प्रैक्टिकल ले रहे थे।
हमने हाथ जोड़कर कहा —
“सर, एक मौका दे दीजिए, गलती हो गई।”
परशुराम सर ने रजिस्टर बंद करते हुए कहा —
“अब नहीं होगा। एब्सेंट लगा दिया है।”
हमने कहा — “सर, एक बार मैडम से पूछ लीजिए।”
वो बोले — “ठीक है, जा कर खुद पूछ लो।”
मैडम थीं प्रिंसिपल श्रीमती शीला वर्मा।
थोड़ी देर बाद वे लंच से लौटकर कॉलेज आईं।
मैंने डरते हुए कहा —
“मैडम, साइकिल पंचर हो गई थी, इसलिए लेट हो गया।”
मैडम ने चश्मा ठीक करते हुए कहा —
“पंचर हुआ तो एक घंटा लग जाता,
पर तुम तो सीधे दो बजे पहुंचे हो!”
मैंने पूरी गंभीरता से कहा —
“मैडम, साइकिल को धक्का देने में ही दो घंटे लग गए,
फिर चिरगांव आकर ठीक कराया।”
मैडम मुस्कुराईं —
“ठीक है परशुराम, इनका एग्जाम ले लो।”
अब क्या था —
हम दोनों फौरन लैब की ओर दौड़े और बोले —
“सर, मैडम ने कह दिया है!”
परशुराम सर बोले — “चलो, ठीक है।”
और फिर बड़ी चालाकी से मेरा वो साथी राजकुमार सविता
भी मेरे साथ प्रैक्टिकल दे बैठा।
🎯 पंचलाइन:
उस दिन मुझे समझ आया —
“साइकिल पंचर से ज़्यादा दिमाग पंचर हो तो मैडम भी कुछ नहीं कर सकती!” 😄
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