दरबार का चाकू
दरबार का चाकू
(एक सच्ची घटना – लेखक: विनय तिवारी)
साल था 2010 या शायद 2011।
चाचा का लड़का अंशू उस वक्त दस बरस का था।
पास के गांव मुराटा में माता का दरबार लगता था। कहते थे —
वहां देवी साक्षात उतरती हैं, लोगों के मन की बातें जानती हैं,
मनोकामनाएँ पूरी करती हैं, और हर समस्या का समाधान देती हैं।
मैं भी जिज्ञासावश वहां जाने को तैयार हुआ। अंशू ने जिद की तो उसे साइकिल पर आगे बिठाया और निकल पड़ा।
मुराटा मुश्किल से दो किलोमीटर दूर था।
करीब पंद्रह मिनट में पहुंच गया। साइकिल ताला लगाई, और भीड़ के बीच जगह तलाशने लगा।
अंशू पीछे था।
दरबार के सामने एक लड़की देवी से ग्रस्त थी —
उसकी जीभ बाहर निकली हुई, सांसें तेज़, बाल खुले और बिखरे हुए,
सामने नींबू रखे थे और उनके ऊपर एक चाकू रखा था।
वातावरण देवी के जयकारों से गूंज रहा था।
मैं लगभग आठ मीटर पीछे था जब अचानक उसने वह चाकू उठाया —
और सीधे हमारी तरफ फेंक दिया!
पल भर को समय जैसे थम गया।
चाकू अंशू के बालों को छूता हुआ दीवार से जा टकराया।
हम दोनों सिहर गए।
भीड़ दौड़ी, हमें पकड़ लिया।
किसी ने पूछा — “क्या तुमने बेल्ट पहन रखी है?”
मैंने कहा — “नहीं।”
उन्होंने अंशू की तरफ देखा — वह बेल्ट पहने था।
बोले — “जाओ, बेल्ट उतार कर आओ!”
मैंने वहां से लौटना ही बेहतर समझा।
बतासे का ठेला लगा था, वहीं बतासे खाए और घर लौट आया।
पर मन आज तक नहीं लौटा —
वह चाकू बालों से छूकर क्यों निकल गया?
इतनी दूरी से वह निशाना कैसे लगा सकती थी?
और अगर सच में देवी थी — तो एक दस साल के बालक से द्वेष क्यों?
जो मंदिर में बकरे का कान स्वीकार करती है,
उसे चमड़े की बेल्ट से कैसी आपत्ति?
हमारे ग्रंथो में तो लिखा है 12 वर्ष से छोटे बच्चों को कोई अपराध नहीं लगता।
अंशू तो अबोध था — क्या उसके वस्त्रों का चुनाव भी अपराध था?
ईश्वर वही है जो बुद्धि दे,
ना कि वह जो डर से झुकाए।
तब से मैंने किसी दरबार में कदम नहीं रखा।
हजारों देवी-देवताओं, दरबारों और चमत्कारों पर पढ़ा-लिखा,
पर पाया — सब मन की अवस्था है, दिमाग की हलचल है।
मेरे लिए अब ईश्वर प्रकृति है —
जो बिना किसी चमत्कार के भी हर पल करिश्मा करती है
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