लल्लू की कंघी

लल्लू की कंघी

लेखक – विनय तिवारी
      सर्ट पर क्रीच, बेलबॉटम पैंट, बाल एकदम टनाटन — मैं अचंभित था।
पचास किलोमीटर बाइक चलाकर आना, वो भी हेलमेट के साथ,
सूरत-ए-हाल तो बिगड़ ही जाती है,
मेकअप, हुलिया सब उड़ जाता है,
पर लल्लू तो जैसा का तैसा!
रहस्य तो कुछ था।

जब मेरी नज़र लल्लू की जेब पर पड़ी,
तो असली कहानी समझ आई —
वो “पेन जैसी दिखने वाली कंघी”!
हर वक्त जेब से ऐसे लटकती,
मानो उसी जगह की मालकिन हो।

सर्ट के साथ उसकी ऐसी पकड़,
कि बिना खींचे बाहर न आए।
लल्लू खेत में झुककर पानी दे रहा हो
या सड़क पर दौड़ रहा हो —
कंघी की पकड़ ऐसी कि लटक जाएगी पर टपकेगी नहीं।

कभी मज़ाक में दोस्तों ने निकालने की कोशिश की,
पर जेब का कोना फट जाएगा,
तब जाकर बाहर निकलेगी!

अगर किसी दिन कंघी खो जाती,
तो उसी वक्त साइकिल घर से निकलती,
और तीस मिनट में नई कंघी जेब में होती।

जुदा न हुई कंघी, उम्र ही बढ़ती रही,
बदल गया ज़माना, सान कंघी की बढ़ती रही।
बदलती रही साइज जेबों की, फर्क न पड़ा,
पांच की कंघी सदा धड़कन बढ़ाती रही।

दौर बदले, लोग बदले, रिश्ते बदलते रहे,
बालों के रंग बदलते रहे, जीवन के ढंग बदलते रहे,
पर कंघी न बदली, लल्लू न बदला,
लोगों के शौक बदलते रहे।

इंसान बदलते युग में भी कुछ आदतों, कुछ चीज़ों और कुछ शान पर कायम रहता है।

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