नाव से ट्रेन तक : स्वप्न और यथार्थ का सेतु

नाव से ट्रेन तक : स्वप्न और यथार्थ का सेतु
✍️लेखक : विनय तिवारी
बचपन में मैं धमना पढ़ने जाता था।
मेरे गाँव और धमना के बीच बहती है बेतवा नदी। उस समय नदी पार करने का एकमात्र साधन नाव थी। वही नाव हमारी स्कूल-यात्रा की गवाह थी — कभी शांत जल, कभी तेज धारा, कभी भीगते कपड़े, कभी डर और कभी रोमांच।
आज वहाँ सड़क का पुल बन चुका है।
समय ने सुविधा दे दी है।
जो कभी जोखिम था, वह अब सामान्य है।
पर कल रात सपने ने एक नया ही दृश्य रच दिया।

न नाव थी, न साधारण पुल।
मेरे घर तक एक छोटी-सी ट्रेन आती थी। कारण बड़ा सीधा था — मेरे पास ट्रेन का पास था, और नियम यह था कि जिसके पास पास होगा, ट्रेन उसे लेने आएगी।
वास्तविकता से इसका कोई संबंध नहीं।
धमना के आसपास ट्रेन का नामोनिशान भी नहीं।
फिर भी सपना इतनी दृढ़ता से इसे सच की तरह प्रस्तुत कर रहा था, जैसे यही जीवन का नियम हो।
यहीं स्वप्न का रहस्य है।
मन इतिहास को जस का तस नहीं दोहराता।
वह उसे तोड़ता है, जोड़ता है, रंगता है और फिर एक नई कथा गढ़ देता है।
बचपन की नाव,
वर्तमान का पक्का पुल,
और कल्पना की निजी ट्रेन —
तीनों मिलकर एक चौथा दृश्य बना देते हैं।
नाव सामूहिक थी — सब साथ पार करते थे।
पुल सार्वजनिक है — सबके लिए खुला है।
पर ट्रेन जो सिर्फ मेरे लिए आती है — वह शायद मन का एक खेल है।
कहीं यह विशेष होने की अवचेतन चाह तो नहीं?
कहीं यह सुविधा की अतिशयोक्ति तो नहीं?
सपने में पुल रस्सी का था और खुलकर किनारे रख दिया गया था।
जैसे मन कह रहा हो —
“जो स्थायी लगता है, वह भी क्षणिक है।”

उसी समय मैथली अपनी मोटरसाइकिल लेकर आया और बिना झिझक नदी के गहरे पानी में उतर गया। वह धीरे-धीरे पूरा डूब गया और पानी के अंदर ही अंदर उस पार निकल गया—जैसे पानी उसके लिए कोई बाधा ही न हो।

नदी कहीं बहुत गहरी थी, तो कहीं बिल्कुल उथली। गिरजाशंकर उसे पैदल ही पार कर रहा था। मैंने भी उसी का रास्ता चुना, पर जैसे ही किनारे पहुँचा, वहाँ पानी नहीं बल्कि बदबूदार कीचड़ था। मैंने घुटने मोड़े और उस कीचड़ में कूद गया। पास ही बैठी गणेशी मुझे देख कर हँसने लगी। कीचड़ में सना हुआ मैं बस यही सोच रहा था कि आगे पानी मिलेगा तो खुद को धो लूँगा।

और तभी नींद खुल गई।
शरीर ने अपना सीधा-सा कारण बताया — मूत्रत्याग की आवश्यकता।
तभी समझ आया —
स्वप्न केवल दार्शनिक नहीं होते, वे जैविक भी होते हैं।
शरीर संकेत देता है, मन उसे प्रतीक बना देता है।

पर इस पूरे अनुभव ने एक बात सिखाई —
जीवन स्वयं भी एक प्रकार का स्वप्न है।
हम नाव से शुरू करते हैं, पुल तक पहुँचते हैं,
और मन कभी-कभी उसे ट्रेन बना देता है।
यथार्थ अपनी जगह ठोस है।
पर स्वप्न उसे कहानी बना देता है।

कहानी का संदेश: कभी-कभी मंजिल (बाथरूम) तक पहुँचने के लिए दिमाग हमें कीचड़, नदी और न जाने किन-किन रास्तों से ले जाता है!

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