आंगन के बदलते रंग

आंगन के बदलते रंग
✍️लेखक : विनय तिवारी


भाग 1: बचपन की दहलीज और सतरंगी सपने

कुसुम भाइयों में सबसे छोटी। और कुसुम से छोटी एक बहन थी। जब कुसुम महज आठ वर्ष की हुई, तभी से रसोई के बर्तनों की खनक और माँ के घरेलू कामों में उसका हाथ बंटाना शुरू हो गया था। घर के बड़े भाई ही ट्यूशन पढ़कर ज्ञान अर्जित कर रहे थे, लेकिन कुसुम का स्कूल में दाखिला नहीं हुआ था। वैसे, वह पढ़ने में बेहद होशियार और मेहनती थी।
जब आठ साल की उम्र में आखिरकार उसे स्कूल भेजा गया, तो उसकी कुशाग्र बुद्धि को देखते हुए उसे सीधे तीसरी कक्षा में प्रवेश मिल गया। वह अपनी सहेलियों के साथ हंसती-गाती स्कूल तो जाती, लेकिन उस अल्हड़ उम्र में भी स्कूल जाने से पहले वह परिवार के आठ लोगों के लिए खाना बनाती, झाड़ू-पोछा करती और फिर बस्ता उठाती।
धीरे-धीरे माँ ने अपनी सारी जिम्मेदारियां चुपचाप बेटी के नाजुक कंधों पर दे दीं। कुसुम को भी लगने लगा कि शायद 'बेटी' शब्द का पर्यायवाची ही 'जिम्मेदारी' होता है। खैर, वह काम के बोझ के बीच भी पढ़ाई का आनंद लेती रही और देखते ही देखते उसने मिडिल स्कूल पास कर लिया।
अब भाइयों को उसकी पढ़ाई से ज्यादा उसके हाथ पीले करने की चिंता सताने लगी। पिताजी ने एक 'अच्छा घर' देखकर कुसुम का विवाह तय कर दिया। शादी की बात सुनकर कुसुम का मन मयूर नाच उठा। उसके मन में रंग-बिरंगे सपने तैरने लगे। जब भी कोई ससुराल का जिक्र करता, उसके गालों पर हया की लाली बिखर जाती। वह सोचती कि वह अपनी सास, जेठानी, ननद और देवर—सबको अपने प्रेम से वश में कर लेगी। वह मायके के संस्कारों और मां-बाप की इज्जत को आंच नहीं आने देगी। वह गर्व से सोचती, "कोई मेरे मायके पर उंगली उठाकर तो देखे!"

भाग 2: हकीकत का धरातल और बिखरते ख्वाब

धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ। शुरुआती दिनों में कुसुम को ससुराल में पलकों पर बिठाया गया। शादी का पहला साल तो जैसे मायके के चक्कर काटते ही बीत गया। जब भी वह मायके आती, सहेलियों के बीच अपने ससुराल की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकती।
पर जनाब, हनीमून पीरियड भला कब तक चलता?
जैसे ही साल बीता, ससुराल वालों के मुखौटे उतरने लगे और असली चेहरे सामने आ गए। सास के नखरे, जेठानी की अकड़, ननद के तीखे ताने और देवर की चुगलियां—अब कुसुम के 'डेली रूटीन' का हिस्सा बन चुके थे। बचपन के आंगन में देखे गए वो सतरंगी सपने न जाने ससुराल के किस कोने में दम तोड़ चुके थे। अब तानों की उसे आदत सी हो गई थी। कुसुम भी समय के साथ यह कड़वा सच समझ चुकी थी कि सास कभी माँ नहीं बन सकती, ननद कभी सगी बहन नहीं हो सकती और देवर कभी अपना बेटा नहीं बन सकता।
दिन बीतते गए, कुसुम के आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजीं। इसी बीच ससुराल वालों ने अपनी मीठी-मीठी बातों के जाल में फंसाकर कुसुम की सगी छोटी बहन का विवाह उसके देवर से करवा दिया। अब दोनों बहनें जेठानी-देवरानी बन चुकी थीं।
अब यह कुनबा लगभग १५ लोगों का जंबो-परिवार बन चुका था। इतने बड़े परिवार का नियम था—'अपना काम निकालो और चलते बनो।' बच्चों की परवरिश की किसे चिंता थी? जब कुसुम के बेटा हुआ, तो दो-तीन दिन की औपचारिक देखरेख के बाद उसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया। खुद जच्चा (कुसुम) को ढंग का पोषण नहीं मिल रहा था, तो बच्चे के लिए दूध की व्यवस्था की बात सोचना ही बेमानी था।
इन तमाम दुखों के बीच कुसुम ने असीम सहनशीलता का परिचय दिया। मगर उसकी छोटी बहन (जो अब देवरानी थी) इतनी सहनशील नहीं थी। जब भी उसका पति उसे डांटता या ससुराल वाले कुछ कहते, तो वह अपना सारा गुस्सा अपने मासूम बच्चों को बेरहमी से पीटकर निकालती।

भाग 3: बंटवारा, बदलती भूमिकाएं और नया सवेरा

वक्त का पहिया घूमा और संयुक्त परिवार की दीवारें दरक गईं। तीनों भाई अलग-अलग हो गए। जमीन-जायदाद के हिस्से हो गए। अलग होने से ननद-देवर के तानों से तो मुक्ति मिल गई, लेकिन जिम्मेदारियों का पहाड़ और बड़ा हो गया। अब घर के काम के साथ-साथ कुसुम को खेतों में भी पति का हाथ बंटाना पड़ता था।
अब तो उसकी जिंदगी चौबीसों घंटे चलने वाली मशीन बन चुकी थी। सुबह सूरज उगने से पहले जागना, झाड़ू-पोछा करना, बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, उनका टिफिन बनाना, फिर सबका खाना, जानवरों को चारा देना, उनकी सानी-पानी करना, मंदिर जाना, कंडे (उपले) थोपना, फिर खेत से घास का गट्ठर सिर पर लादकर लाना और शाम को थककर चूर होने के बाद फिर से चूल्हा फूंकना। रात को जब वह पूरी तरह टूट चुकी होती, तब भी बिस्तर पर जाकर बच्चों को कहानी सुनाती और सुनाते-सुनाते खुद सो जाती। सुबह सबसे पहले जागना मानो उसकी नियति बन चुका था।
वक्त पंख लगाकर उड़ गया। कुसुम की उम्र ढलने लगी, बच्चों की शादियां हो गईं। कुसुम ने सोचा था कि अब 'शिवानी' (बहू) घर में आ गई है, तो उसे घर की चाबी सौंपकर वह अपनी जीवनभर की थकान उतारेगी।
लेकिन जिम्मेदारियां भी किसी वफादार साए की तरह होती हैं, पीछा ही नहीं छोड़तीं!
हाँ, अब थकान का स्वरूप बदल गया था। पोते-पोतियों (नाती) के पीछे-पीछे भागने में जो थकान होती, उसमें एक अजीब सा आनंद था। उस असीम सुख के आगे जीवनभर की प्रताड़नाएं और थकान बहुत बौनी लगने लगती। जब उसका नाती तुतलाते हुए कहता, "दादी, आप छुपो... मैं तुम्हें ढूंढता हूँ!" तो कुसुम के सारे पुराने जख्म जैसे पल भर में भर जाते।

भाग 4: दो पीढ़ियों का द्वंद्व और असमंजस में राहुल

समय ने कुसुम को अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढलना सिखा दिया था। लेकिन अब जमाना बदल चुका था। आज की बहुएं सास को वह अंधभक्तों वाला सम्मान नहीं देती थीं, जो कभी कुसुम ने अपनी सास को दिया था। कुसुम को अपनी बहू शिवानी का अत्यधिक खुलापन और आधुनिकता रास नहीं आती थी। शिवानी 'इंस्टा-रील' और स्मार्टफोन के युग की लड़की थी, जिसके पास खाना बनाने के लिए चूल्हा नहीं, बल्कि मॉडर्न गैस स्टोव था। आज की इस चकाचौंध से बेपरवाह कुसुम आज भी अपनी बहू से उसी सम्मान और मर्यादा की उम्मीद करती थी, जो उसने कभी अपनी सास के आगे सिर झुकाकर निभाई थी।
एक दिन कुसुम ने शिवानी को पुराने तौर-तरीकों और मर्यादा में रहने की नसीहत दे डाली। बस फिर क्या था! इसी बात को लेकर सास-बहू के बीच 'शीत युद्ध' शुरू हो गया। शिवानी पढ़ी-लिखी थी, वह आज के स्वतंत्र दौर के हिसाब से जीना चाहती थी, न कि किसी की बंदिशों में।
कुसुम के बेटे राहुल ने अक्सर अपनी माँ को अकेले में आंसू बहाते देखा था। अब वह उसे दुखी नहीं देखना चाहता था। लेकिन वह आज के समय और परिस्थितियों को भी बखूबी समझता था। इसलिए वह 'न्यूट्रल' (तटस्थ) में रहने को मजबूर था। उसने दोनों को अपने-अपने हाल पर छोड़ दिया था; क्योंकि वह न तो शिवानी के खिलाफ बोल सकता था और न ही अपनी माँ को गलत ठहरा सकता था।
माँ ने जहां अभावों, समझौतों और आंसुओं के बीच अपनी जिंदगी जी थी, वहीं बहू को सब कुछ थाली में सजा-सजाया और सामान्य मिला था। यही कारण था कि भावनाएं सही और गलत का फैसला नहीं करने देती थीं।
राहुल की त्रासदी का अंत देखिए:
सुबह जब सोकर उठता है, तो माँ अपना दुखों का पिटारा खोलकर बैठ जाती है; और शाम को जब थक-हारकर ऑफिस से लौटता है, तो पत्नी अपनी शिकायतों का मोर्चा खोल देती है। राहुल रोज एक गहरे असमंजस के साथ बिस्तर पर सोने चला जाता है और हर सुबह बस एक ही उम्मीद के साथ आंखें खोलता है कि... जाने वो दिन कब आएगा, जब मां और पत्नी दोनों किचन में एक साथ बैठकर बिना किसी शिकवे के ठहाके मार रही होंगी!

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