कट्टा की बारात

    कट्टा की बारात

(देसी व्यंग्य कथा — विनय तिवारी)
जिला झांसी के चिरगांव ब्लॉक का एक छोटा-सा गांव है धमना।
वहीं एक व्यक्ति रहा करता था — नाम था उसका कट्टा।

अब नाम ऐसा कि सुनने वाला दो बार सोचे — पर गांव में कोई हैरान नहीं होता था।
कट्टा सबका प्यारा, भला आदमी था।

एक दिन गांव की एक बारात निकलनी थी।
ट्रैक्टर उसी का था, और चलाना भी उसी का काम।
लेकिन रातभर जागने के बाद थककर बेचारा ट्रॉली में ही लेट गया।
ड्राइविंग का जिम्मा किसी और ने संभाल लिया।

रात बीत गई, बारात पहुंची, नाच-गाना हुआ, खाना-पीना हुआ,
और जब लौटने का वक्त आया — तब तक भोर के तीन बज चुके थे।

रास्ते में पड़ा सैंदरी थाना।
ट्रैक्टर गुजरा ही था कि पुलिस ने ललकार दी —
“ओए! कौन है? कहां से आ रहे हो?”

बाराती सहम गए।
जो चला रहा था, बोला — "भईया, ट्रॉली में से कट्टा को उठा लो।”

बस फिर क्या था!
सिपाही की मूंछ तन गई, राइफल की नली सीधी —
“अच्छा! पुलिस को धमकाते हो? कट्टा भी रखते हो?”

और फिर दो झन्नाटेदार तमाचे बरस गए बेचारे ड्राइवर पर।
ड्राइवर हकलाता बोला — “साहब, आदमी का नाम है... कट्टा!”

थोड़ी देर के लिए सन्नाटा, फिर ठहाका।
सिपाही बोला — “नाम भी ऐसा कि दिल दहले!”

फिर भी पुलिस का भरोसा नहीं टला।
पूरी ट्रॉली खाली करवाई,
घान का चिल्ला बाहर निकलवाया,
बीसों बारातियों की तलाशी ली।

जब कोई असली “कट्टा” नहीं मिला,
तब जाकर पुलिस को यकीन हुआ कि “कट्टा” सच में एक आदमी है, हथियार नहीं।

बारात को जाने दिया गया,
पर यह घटना लंबे समय तक सैंदरी वालों की हंसी का कारण बनी रही।

गांव में वैसे भी नाम बड़े दिलचस्प थे —
कट्टा, टुंडे, घसीटे, कडोरे, खचोरे, सुल्ले, भदईं, चिनू, बटोले...
अब भला ऐसे नामों के साथ भ्रम न हो तो क्या हो!

दरअसल, एक जमाना था जब ऊँची जातियों के लोग
हरिजन या पिछड़े लोगों को ठीक-ठाक नाम रखने ही नहीं देते थे।
गांवों के भोले लोग इसी में खुश थे —
नाम भले “कट्टा” हो, पर दिल के सच्चे थे।

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