कान्हा – एक अधूरी प्रेमकथा
कान्हा – एक अधूरी प्रेमकथा
✍️ लेखक – विनय तिवारी
कान्हा... नाम ही प्रेम का पर्याय था।
पूरा नाम कृष्ण मुरारी।
माँ के स्नेह से वंचित, पाँच वर्ष की आयु में ही वह संसार की सबसे बड़ी कमी झेल चुका था — माँ का जाना।
पिता संगीत पार्टी में रहते — सुर और ताल में डूबे हुए, पर पुत्र के लिए मन के तार कभी नहीं झंके।
धीरे-धीरे कान्हा ने बचपन की चौखट पार की, और युवावस्था की देहरी पर आ खड़ा हुआ।
गाँव के बच्चे रोज़ धमना नदी पार कर स्कूल जाते। उसी टोली में कान्हा भी था।
मैं तब दस वर्ष का था, छठी कक्षा में पढ़ता था, जबकि कान्हा सातवीं में।
कान्हा के दिल में उस समय प्रेम का पौधा अंकुरित हो चुका था।
वह बारेई गाँव की लड़की क्रांति से एकतरफा प्रेम करता था।
मगर कह नहीं पाता था।
उसकी आँखों में क्रांति बस चुकी थी, पर शब्दों में आने की हिम्मत नहीं थी।
वह हमें बड़ी-बड़ी बातें सुनाता —
“एक दिन मैं क्रांति को लेकर मुंबई चला जाऊँगा…”
हम सब हँस देते, पर उसके चेहरे पर वही मासूम यकीन झलकता था।
तब अजय देवगन की फिल्में चल रही थीं — कान्हा अक्सर आईने के सामने आँखें मटकाने का अभ्यास करता,
नाक सिकोड़ता, और हमें “इशारे की कलाएँ” सिखाता।
पर प्रेम के इस साहस को बारेई गाँव के लड़कों का भय दबा देता था।
वो लड़के गुंडे माने जाते थे।
कहते-
“जो हमारे गाँव की लड़कियों को घूरेगा, उसकी आँखें निकाल दूँगा।”
कान्हा हम लोगों से अकड़कर कहता -
हम किसी से नहीं डरते।
पर हम सब जानते थे कि डर भीतर कहीं गहरा था।
हर दिन वह योजना बनाता —
“आज क्रांति से बात करूँगा…”
पर बात कभी न हो सकी।
एक दिन उसने कहा —
“आज स्कूल नहीं जाएँगे।”
हम सब धमना नदी पार कर उसके साथ एक छोटे से झरने के पास पहुँचे।
चारों ओर कंजी के पेड़ थे।
कान्हा ने आदेश दिया — “बॉक्स से कंपास निकालो, आज पेड़ों पर नाम लिखेंगे।”
हम सबने कुछ न कुछ लिखा।
किसी ने अपना नाम, किसी ने दोस्त का।
पर कान्हा चुप था।
वह पूरे एक घंटे तक पेड़ की छाल पर दिल बनाता रहा।
फिर धीरे से लिखा —
“क्रांति ❤️ कृष्ण मुरारी”
बस, वही उसका इज़हार था।
न बोलना पड़ा, न सुनना पड़ा।
उस दिन उसने अपने मन की गांठ खोल दी थी — पेड़ की छाल पर।
समय बीत गया।
कान्हा आठवीं पास कर गाँव छोड़ गया।
क्रांति भी अपनी राह चली गई।
एक अधूरी प्रेमकथा वहीं नदी किनारे रुक गई —
जहाँ पेड़ पर अब भी शायद वो नाम उभरा हो।
कुछ ही वर्षों में कान्हा की आदतें बिगड़ गईं।
जुआ, शराब, सिगरेट — सब उसका हिस्सा बन गए।
पार्टीबाजी में उतर आया, राजनीति में कदम रखा, कांग्रेस से जुड़ा।
वक्ता तो अच्छा था, पर अपने जीवन का वक्त खो बैठा।
टी.बी. ने शरीर को खोखला कर दिया।
और 28 वर्ष की उम्र में कान्हा का अंत हो गया।
लोग कहते हैं, वह प्रेम में हारा हुआ था —
पर शायद सच्चे प्रेमी कभी हारते नहीं।
कान्हा आज भी उन कंजी के पेड़ों के बीच ज़िंदा है,
जहाँ उसने एक दिन लिखा था —
“क्रांति और कृष्ण मुरारी”
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