स्वर्गनामा: एक महात्मा की ग़लती

          स्वर्गनामा: एक महात्मा की ग़लती

लेखक - विनय तिवारी

       स्वर्ग और नर्क के द्वार पास-पास ही थे।
नर्क का दरवाज़ा भव्य, विशाल और अत्यंत आकर्षक था – इत्र छिड़का, रंगीन झालरों से सजा हुआ, ढोल-नगाड़े बजते और अप्सराएं कतार में खड़ी – मानो कोई पाँच सितारा स्वागत समारोह चल रहा हो।
दूसरी ओर स्वर्ग का दरवाज़ा छोटा था, परंतु नक्काशीदार, कलाकृतियों से सुसज्जित। वहाँ न इत्र था, न बैंड-बाजा, बस एक लंबी दाढ़ी वाले बाबा गंगाजल के छींटे मारते हुए आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे।
स्वर्ग और नर्क के बीच एक विशाल दीवार थी – पारदर्शी नहीं, मजबूत और ऐसी कि किसी भी तरफ़ की गतिविधियाँ दूसरी ओर महसूस न हो सकें। लेकिन... एक ध्वनि-गुंजालय (Sound Hall) था – जहाँ से नरक में मधुर संगीत, घुंघरुओं की छनछनाहट और हँसी के ठहाके सुनाई देते थे – ताकि स्वर्ग वाले भी नर्क की मस्ती से वंचित न रहें।
एक महात्मा, जिनका जीवन भजन, योग, प्राणायाम, सात्विक भोजन और नियमों में बीता था – तुलसी माला, रुद्राक्ष और दाल-रोटी के साथ – अंततः दिवंगत हुए।
यमराज स्वयं उन्हें लेने आए – हाथी, घोड़े और विमान के साथ। महात्मा जी भावविभोर हो गए।
सोचने लगे – “वाह! धर्म का फल तो यहीं है।“
स्वर्ग के द्वार पर पहुँचे – कोई लाइन नहीं।
वहीं बगल में नरक का विशाल द्वार था – जहाँ हजारों की भीड़ में लोग झूमते हुए जा रहे थे, जैसे कोई संगीत महोत्सव हो।
अप्सराएं इत्र छिड़कते हुए स्वागत कर रही थीं।
महात्मा जी ठिठक गए...
स्वर्ग में प्रवेश करते ही उन्हें एक अतिथि गृह में रखा गया – एक कमंडल, एक कंबल, एक आसन और एक नियमपत्रक मिला –
“प्रातः 4 बजे स्नान, 9 बजे दाल-दलिया-रोटी, केले के पत्ते पर। दिनभर सत्संग और भजन।“
इधर दीवार के उस पार से नृत्य की आवाज़ें, मधुर गीत और ठहाकों की गूंज महात्मा जी के कानों में रस घोलने लगीं।
उन्होंने गुस्से में बाबा जी को टोका –
“यह क्या अन्याय है! मैंने भजन-पूजन इसलिए किया था?
उधर वाले नरक में और यहां भी उनका संगीत?
मुझे वहां छोड़ आओ!”
बाबा जी ने बहुत समझाया – “मात्र छलावा है, भीतर जाओगे तो पछताओगे।“
परंतु महात्मा जी अड़ गए – बोले, “अब तो और भी जाना है, हजारों साल वहीं रुकूंगा!”
सूचना भेजी गई – यमदूत आए, तलवारें लहराईं और जंजीर डालकर गुप्त द्वार से नर्क में ले गए।
अंदर क्या था?
संगीत बंद।
एक ऑफ़िस में अंगूठा लगवाया गया, फिर दो नर्क-सेवकों ने उन्हें उस लाइन में खड़ा कर दिया जहाँ स्वागत हंटरों से हो रहा था।
चार कोड़े पड़ते ही महात्मा जी चिल्ला उठे – “राम! राम!”

नैतिक निष्कर्ष:
जो चीज़ें दूर से चमकदार और मोहक दिखती हैं, ज़रूरी नहीं कि वे सुखद हों।
मोह का संगीत और इंद्रियों का आकर्षण अक्सर अंत में केवल दर्द ही देते हैं।
धर्म का मार्ग कठिन जरूर है, लेकिन अंततः वही शांति देता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गिरारी सरकार चिरगांव झांसी , Village Girari, block chirgaon, district Jhansi

लल्लू की कंघी

दरबार का चाकू