बुंदेलखंडी हास्य नाटिका: “विलइया चून खा गई"

 बुंदेलखंडी हास्य नाटिका: “विलइया चून खा गई”

✍️लेखक : विनय तिवारी


पात्र:

बाई – पुस्सी की दादी, गुस्सैल, झल्लाती पर बेहद प्यारी

पुस्सी – एक सीधा-सादा विद्यार्थी लड़का

दाढ़ी वाले – स्कूल मास्टर, अनुशासन में सख्त, पर खुद मस्त

फूल – बाई का बेटा, भोला-भाला

विलइया – घर की चालाक बिल्ली, जो हमेशा कोई न कोई शरारत करती है

 

स्कूल का बरामदा — सुबह का समय

 

(बाई तेज़ चाल में आती हैं, झल्लाई हुई)

बाई (झल्लाते हुए):

का गउ मोड़ा! सबेरे-सबेरे दिमाग खराब कर डारो।

(बच्चे पीछे से चिल्लाते हैं):

पुस्सी मूतबे गव बाई!!

(पुस्सी किताब लिए दौड़कर आता है)

पुस्सी:

का हो गओ बाई?

बाई: घरे किवाड़ खुले छोड़ आए! अब उते विलइया सब चून खा गई।

पुस्सी (घबरा के):

अरे चल्लोसन खाई हुज्जे, चून हतोई नहीं!

बाई (गुस्से में):

तू रहन दे! ठठरी के इतनौ बड़ो हो गओ, दिमाग नई है कछू!

स्कूल का अंदरूनी कमरा

(बाई इधर-उधर देखती हैं, मास्टर जी को ढूंढती हैं)

बाई:

कायरे हो

जा होरई पढ़ाई?

बो डाढ़ी वालो मास्टर किते गओ?

(मास्टर जी धीरे-धीरे आराम से बाहर आते हैं)

मास्टर जी:

का हो गओ डुकरो?

बाई (चश्मा पोछते हुए):

ओ तेरी डडियल की, जोई सीखो ते…

और जोई सिखारव मेय मोड़न खो!"

"में तोय डुकरो दिखारई – ठहरी को वधो!"

मास्टर जी (मुस्काते हुए)

बाई: उते विलज्जा चून खा गई..."

(जैसे अपने आपसे बात करती जा रही है)

"इते जो गर्रारब खुद तो डुकरा है… मो से डुकरो केरव।

बेसरम – दाढ़ी वालो मास्टर"

"आन दो फूल खो, साम कैं!"

तै डाढ़ी धरके गुरू बन गओ!

 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गिरारी सरकार चिरगांव झांसी , Village Girari, block chirgaon, district Jhansi

लल्लू की कंघी

दरबार का चाकू