चालू की टटिया - गली क्रिकेट

चालू की टटिया - गली क्रिकेट
✍️लेखक विनय तिवारी 
ग्राम ध्वानी की एक छोटी-सी गली में, जहाँ धूल भरी सड़कें और पुराने नीम के पेड़ माहौल को और रंगीन बनाते थे, बच्चों का एक झुंड क्रिकेट खेलने में मगन था। बल्ला लकड़ी का, गेंद पुरानी टेनिस बॉल, और स्टंप्स? बस तीन टूटी-फूटी टहनियाँ! गली के कोने में चालू भैया का घर था, जो हमेशा बच्चों की शोर-शराबे से तंग रहते थे।
उस दिन खेल जोरों पर था। अनि, गली का सबसे तेज बल्लेबाज, क्रीज पर था। उसने गेंदबाज की गेंद पर जोरदार शॉट मारा। "छक्का!" चिल्लाए बच्चे, लेकिन गेंद सीधे चालू भैया के आँगन में जा गिरी। खटाक! 
कहीं कुछ टूटने की आवाज आई। अरे मेरी टटिया? चालू भैया गुस्से में बाहर निकले, हाथ में लाठी लिए। "कौन मारा ये गेंद? मैं तुम सबके घर जाकर शिकायत करूँगा! अगर ये गेंद किसी को लग जाए तो? बंद करो ये लुडिया पटिया का खेल!"
बच्चे सहम गए। तभी गली के दूसरे छोर से अंशुल के बब्बा, बुजुर्ग मगर जोशीले, लाठी टेकते हुए निकल पड़े।  "अरे चालू, बच्चों को क्यों डाँट रहा है? खेलने दे, बचपन है इनका!" चालू और अंशुल की बब्बा जी में बहस छिड़ गई। गली के बाकी लोग, खासकर जगत सिंह कक्का, जो पास की फूल की दुकान पर बैठे थे, ये तमाशा देखने लगे।
इसी बीच, तभी अंशुल ने चुपके से गेंद उठाई और अनि ने फिर से बल्ला थामा। अंशुल ने गेंद फेंकी, और अनि ने एक और शॉट मारा—इस बार गेंद गली के पार, दूर खेतों में जा गिरी। "छक्का!" बच्चे चिल्लाए। जगत सिंह कक्का, जो अब तक चालू और अंशुल क बब्बा की बहस देख रहे थे, खुशी से उछल पड़े और जोर-जोर से तालियाँ बजाने लगे। "वाह, अनि! मारो और छक्के!" चालू भैया भी हार मानकर हँस पड़े और बोले, "ठीक है, खेलो, लेकिन मेरे आँगन में गेंद मत फेंकना!"
और इस तरह, गली का क्रिकेट फिर शुरू हो गया। चालू भैया भी फूल की दुकान पर कक्का के पास बैठ गए, और सब मिलकर बच्चों का खेल देखने लगे। गली में हँसी-ठहाकों के बीच, वो शाम गाँव की एक और यादगार शाम बन गई।
अंत: गाँव की गलियों में क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि प्यार, झगड़े और मस्ती का मेल है, जो सबको एक साथ जोड़ देता है।

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